बरसात में धूर नाला रोक देता है राह जंगल से गुजरने की मजबूरी हाथियों के खतरे के बीच स्कूल जाते बच्चे, वर्षों से आवेदन और निरीक्षण के बाद भी हालात जस का तस

ओड़गी (द शूटर)। विक्की तिवारी । गांवों तक विकास पहुंचने के दावे और बुनियादी सुविधाओं की चमकती तस्वीरों के बीच दूरस्थ वनांचल में बसे गांवों की कुछ तकलीफें ऐसी भी हैं, जो वर्षों से सरकारी फाइलों और आश्वासनों के नीचे दबी हुई हैं। सवाल यह है कि विकास की इस दौड़ में पीछे छूटते दूरस्थ गांवों के रहवासियों का दर्द आखिर सुनेगा कौन। आपकों बताते चलें कि ओड़गी विकासखंड के ग्राम खोड़ के हरिजन पारा और पंडोपारा की कहानी कुछ ऐसी ही है, जहां करीब 400 ग्रामीण किसी बड़ी परियोजना की नहीं, बल्कि धूर नाला के तुरा घाट पर महज एक छोटी पुलिया की आस लगाए बैठे हैं।
यह पुलिया उनके लिए सिर्फ सीमेंट-कंक्रीट का ढांचा नहीं, बल्कि सुरक्षित जिंदगी तक पहुंचने का रास्ता है। इसके बन जाने से बरसात में पांच किलोमीटर के घने और हाथी प्रभावित जंगल से होकर गुजरने की मजबूरी खत्म हो सकती है और यही सफर महज 100 मीटर में सिमट सकता है। लेकिन वर्षों से आवेदन, गुहार और स्थल निरीक्षण के बावजूद पुलिया नहीं बन सकी।
बारिश होते ही धूर नाला उफान पर आता है और गांव का सीधा रास्ता काट देता है। इसके बाद स्कूली बच्चे हों या बुजुर्ग, महिलाएं हों या बीमार मरीज, सभी को करीब पांच किलोमीटर लंबा जंगल का रास्ता पकड़ना पड़ता है। यह रास्ता केवल लंबा नहीं, जान का जोखिम भी समेटे हुए है। ग्रामीणों के मुताबिक यहां हाथियों की आवाजाही रहती है और पहले इसी मार्ग पर हाथी के हमले में एक राहगीर की जान भी जा चुकी है।
ऐसे में खोड़ के ग्रामीणों का सवाल व्यवस्था से बेहद सीधा है कि क्या किसी और हादसे के बाद इस पुलिया की जरूरत महसूस होगी, या उससे पहले उनकी वर्षों पुरानी पुकार सुनी जाएगी…?


